Monday, June 29, 2009

ब्रह्म भाव सर्वोत्तम है

सभी सत्य-प्रेमियों का स्वागत करते हुये चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। आज बात करते हैं कि नानाविध साधन पद्धतियों में श्रेष्ठ कौन सा है। इस संबंध में कहा जाता है-

उत्तमो ब्रह्म-सद्भावो ध्यानभावस्तु मध्यमः ।
स्तुतिर्जपोऽधमोभावो बहिर्पूजा अधमाधमा ॥

ब्रह्म-भाव उत्तम है, मध्यम है-ध्यान भाव। जप और स्तुति निम्न श्रेणी के भाव हैं तथा बाह्यपूजा तो निम्नातिनिम्न यानि अत्यंत निम्न श्रेणी का है।

इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं। यह आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि निम्न श्रेणी के साधक उच्च श्रेणी के साधकों को कई बार नास्तिक समझ बैठते हैं वो भी सिर्फ़ इसलिये कि वे मंदिर नहीं जाते अथवा मूर्त्तिपूजा का समर्थन नहीं करते। ये बात ठीक से समझने योग्य है कि द्वैत ही संसार है वो प्रीतिकर हो या अप्रीतिकर यह दूसरी बात है। और यदि कहें भक्त और भगवान तो फ़िर द्वैत अभी बचा ही हुआ है। प्यारा जरूर है ये संबंध पर सत्य नहीं। सत्य तो अद्वैत है। अब ऐसे-ऐसे धर्म के हितैषी पड़े हैं जिन्हे जरा-जरा सी बात पर लगता है कि उनके इष्टदेव का अपमान हो गया। वस्तुतः इनका धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। और धर्म कोई लंगड़ा थोड़े ही है जिसे इनके वैशाखियों की जरूरत है। कृष्ण का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण वचन है गीता में-

येऽपि अन्यदेवाभक्ताः यजन्ते श्रध्यान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्ति अविधिपूर्वकम ॥
दूसरे देवों की ्श्रधापूर्वक की गई पूजा भी वास्तव में गलत है, अविधिपूर्वक है।

कृष्ण का ईशारा इसी ओर है। और ये जो विभिन्न साधनाओं की बात भी की गई वह ब्रह्मज्ञानी के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि साधारण मानओं के लिये कही गई है। क्योंकि ब्रह्मवेत्ता तो किसी तरह के भेद को जानता ही नहीं है। लाख भेद दिखता हो पर भेद वस्तुतः है नहीं। जैसे दश घड़ों में जल भरा हो तो उनमें दश सूर्य दिख सकते हैं पर सूर्य है तो एक ही। वैसे ही लाख अलग-अलग साधा पद्धति दिखती हो वस्तुतः बात एक ही है। पर ब्रह-भाव से पहले इस सत्य का पता नहीं चलता। ब्रह्म-भाव की जो इतनी प्रसंशा की जाती है वो दूसरे मार्गों को नीचा दिखाने के लिये नहीं बल्कि इसलिये ताकि सर्वसाधारण की ब्रह्म की तरफ़ गति हो सके।

Wednesday, June 10, 2009

तीन चीजें जिनसे दूर रहना चाहिये: अभिमान, गौरव और प्रतिष्ठा

सभी आत्मीयजनों का स्वागत है। आईये चर्चा को और आगे बढ़ाया जाये। मानव मन की एक खासियत होती है, जो वो कर रहा है उसे दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझने की। मेरा देश महान, मेरी जाति महान, मेरा धर्म महान आदि। आध्यात्मिक मनुष्य को इनसे भरसक बचना चाहिये। कहा गया है-

अभिमानं सुरापानं गौरवं रौरवं ध्रुवम।
प्रतिष्ठा शूकरी विष्ठा त्रयं त्यक्त्वा हरिं भजेत॥
अर्थात अभिमान सुरापान जैसा है, गौरव निश्चित ही रौरव (एक नरक का नाम) है। प्रतिष्ठा शूकरी विष्ठा है। इन तीनों को छोड़कर हरि भजन करना चाहिये।

गौर से देखें तो आप पायेंगे कि वास्तव में इन तीनों से अहंकार तृप्ति के सिवा और कुछ नहीं मिलता। ये अहंकार के भोजन हैं, जितना भोजन मिलेगा अहंकार और मजबूत होता जायेगा और उसी अनुपात में हम सत्पथ से दूर होते जायेंगे।

Sunday, May 31, 2009

मैं कौन हूँ: एक स्वाभाविक प्रश्न

सभी पथिकों का स्वागत करते हुये पिछली चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। पिछले पोस्ट में जिस विधि का जिक्र किया गया था उससे ये प्रतीति तो आ ही जायेगी कि मैं शरीर नहीं हूं। आरंभ में यह प्रतीति बार-बार खो जायेगी। कभी बिल्कुल स्पष्ट दिखेगा कभी चूक जायेगा। इससे निराश न हों और प्रयोग जारी रखें। धीरे-धीरे यह बात दृढ़ता से आपके लिये साफ़ हो जायेगी और आप मह्सूस कर पायेंगे कि आप शरीर नहीं हैं। "मैं शरीर नहीं हूं" इस खयाल के दृढ़ होते ही दो स्वाभाविक प्रश्न मन में उठते हैं-


१) यदि मैं शरीर नहीं हूं तो फ़िर मैं कौन हूं?

२) मैं शरीर नहीं हूं तो शरीर का क्या करे?


इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं। मैं कौन हूं इस प्रश्न का स्वाभाविक रूप से उठना आधी यात्रा पूरी कर लेने जैसा है। एक बार यह प्रश्न सम्यक रूप से आपको पकड़ ले फ़िर परमात्मा की दिशा में आपकी गति निश्चित है। ये जो प्यास है ये आपको खींचकर पानी तक ले जायेगी। ध्यान दें, ये प्रश्न आप्को रटना नहीं है बल्कि आप यदि ठीक दिशा में काम कर रहे हों तो अपने आप उठेगा।

दूसरी महत्त्वपूर्ण चीज ये है कि मैं अगर शरीर नहीं हूं तो फ़िर इस शरीर के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये। अक्सर यहां लोग चूक जाते हैं और सोचते हैं यदि ऐसा है तो शरीर को आदर देने की क्या जरूरत है? इस ख्याल ने अब तक भारी गड़बड़ की है और तथाकथित धार्मिक लोगों ने शरीर को सताने के सब तरह के उपाय खोज लिये हैं। इनसे बचें। ऐसा समझें-एक इनसान जिस घर में रहता है और भली प्रकार से जानता है कि वो घर नहीं है, उसे क्या करना चाहिये? क्या घर की साफ़-सफ़ाई जरूरी नहीं? अगर घर टूटता हो तो क्या उसकी मरम्मत जरूरी नहीं, अन्यथा तो बरसात काटनी मुश्किल हो जाये। शरीर भी एक घर की भांति है और इसकी सही देखभाल जरूरी है। यों कहें कि शरीर आत्मा के लिये मंदिर है। और मंदिर के लिये मन में आदर होना ही चाहिये।

आज की चर्चा को विराम देने से पहले एक बात और। हर दो-तीन पोस्ट के बाद एक पोस्ट सिर्फ़ परिचर्चा की होगी जिसमें कोई भी प्रश्न यदि आपके मन में आता हो और आध्यात्मिक उन्नति से संबंधित हो तो उस संबंध में बात की जायेगी। अपने प्रश्न टिप्पणि में दे दें।

Friday, May 15, 2009

कैसे जानें कि शरीर से परे भी कुछ है

सबसे पहले तो स्वागत करता हूं उन सब मित्रों का जिन्होने इस पथ में रुचि दिखाई है क्योंकि स्वयं को जानने से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है और श्रेष्ट हमेशा स्वागतयोग्य होता है। आज चर्चा करते हैं इस संबंध में कि कैसे जानें कि शरीर से परे भी कुछ है। विचार करेंगे तो पायेंगे कि जो विधि मैं बता रहा हूं वह साधारण होते हुये भी अत्यंत कारगर है। यह खयाल में ले लें कि किसी भी चीज को जानने के लिये कई प्रमाणों की आवश्यकता होती है। मुख्य रूप से प्रमाण ऐसे गिनाये जा सकते हैं-

१.आप्त वचन प्रमाण अर्थात श्रेष्ठ पुरूषों द्वारा कहे गये वचन
२.श्रुति प्रमाण अर्थात श्रेष्ठ पुस्तकों दरा प्राप्त प्रमाण
.युक्ति प्रमाण अर्थात तर्कसंगत तरीके से उदाहरण देकर समझाई गई बात
४.
अनुभव प्रमाण

ध्यान रहे कि प्रथम तीन प्रमाण सहायक हैं चौथे के लिये। जब तक सत्य अपना निजि अनुभव न बने तब तक अन्य सभी प्रमाण निष्फल हैं। तो इससे पहले कि हम आगे सत्य की कुछ चर्चा करें मैं युक्ति प्रमाण से आपको प्रयोग करने को कहता हूं।

तरीका बहुत आसान है। सुविधा के लिये
इसे तीन चरणों में विभाजित करें
अ)
अपने आसपास निरीक्षण करें, चीजों को देखें और
ब) जो दिखे उससे निष्कर्ष निकालें और अंत में
स)
इस प्राप्त निष्कर्ष का अपने ऊपर प्रयोग करें

आईये शुरू करते हैं। देखें अपने आसपास ....और सोचें...मुझे मकान दिखाई पड़ता है और मैं मकान नहीं हूं...मुझे फूल दिखाई पड़ता है और मैं फूल नहीं हों....मुझे दीवार दिखाई पड़ती है और मैं दीवार नहीं हूं...इस तरह जितनी भी चीजें दिखाई देती हैं उन्हे देखें और सोचे कि क्या मैं यह हूं, आप पायेंगे कि आप वह नहीं हैं बल्कि आप उस चीज से सर्वथा भिन्न हैं। अब निष्कर्ष निकालें....जो दिखाई पड़ता है (अर्थात दृश्य) और जो देखता है (अर्थात द्रष्टा) एक नहीं होते बल्कि अलग-अलग होते हैं। इसी तरह आप प्रयोग करेंगे तो पायेंगे कि ज्ञान और ज्ञात एक नहीं होते। अब इस प्राप्त निष्कर्ष का उपयोग करते हैं। यह निष्कर्ष आपके अपने प्रयोग पर आधारित है अतः इसमें शक की कोई गुंजाईश ही नहीं है। अब देखें ...आपको अपना शरीर दिखाई पड़ता है? निश्चित रूप से उत्तर हां है...अब हमारा निष्कर्ष कहता है दृश्य और द्रष्टा एक नहीं होते...फ़िर यदि आपको शरीर दिखाई पड़ता है तो आप शरीर
कैसे हो सकते हैं? इस पर बार-बार विचार करें। एकबार यह आपके सामने साफ हो जाये कि आप शरीर नहीं हैं फ़िर आगे की यात्रा आसान हो जाती है। मैं शरीर नहीं हूं यह बात हमें समझनी है, केवल इसलिये सच मानकर रटने की कोई जरूरत नहीं है कि किताबों में ऐसा लिखा है। अगले अंक में इस चर्चा को और आगे बढ़ायेंगे तब तक के लिये इस प्रयोग को जारी रखें।

Tuesday, May 12, 2009

साधक के लिये कुछ उपयोगी बातें

आप सबका स्वागत है इस नये चिट्ठे पर। इसका उद्देश्य है बिना किसी लाग-लपेट के, दर्शन के उहापोह से परे, विविध कर्मकांडों से अलग आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग की चर्चा। जो भी इस पथ के पथिक हैं वे साधक हैं। साधक का ये कतई मतलब नहीं है कि वो इस संसार से दूर हिमालय की कंदराओं में निवास करे। इस बारे में आगे विस्तार से चर्चा की जायेगी। फ़िलहाल कुछ आवश्यक बातें जो खयाल में रखने लायक हैं -

.साधना के लिये उम्र की कोई सीमा नहीं है। कहा जाता है-तेजसां हि वयः न समीक्ष्यंते-अर्थात तेजस्वियों की उम्र नहीं देखी जाती। मतलब साफ़ है-जब से जागे तभी सवेरा।

२.किसी खास समय के चक्कर में न पड़ें। प्रभु-स्मरण के लिये हर घड़ी शुभ घड़ी है।

३.किसी खास स्थान का भी कोई सीधा संबंध साधना से नहीं है क्योंकि सत्य तो सर्वत्र उपलब्ध है। कहा जाता है-

इदं तीर्थं इदं तीर्थं भ्रमन्ति तामसा जनाः
आत्म तीर्थं न जानन्ति कथं मोक्षो वरानने

अस्तु, आत्म-तीर्थ को न जाना तो बाकी सारे तीर्थ निरर्थक हैं।