Wednesday, June 10, 2009

तीन चीजें जिनसे दूर रहना चाहिये: अभिमान, गौरव और प्रतिष्ठा

सभी आत्मीयजनों का स्वागत है। आईये चर्चा को और आगे बढ़ाया जाये। मानव मन की एक खासियत होती है, जो वो कर रहा है उसे दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझने की। मेरा देश महान, मेरी जाति महान, मेरा धर्म महान आदि। आध्यात्मिक मनुष्य को इनसे भरसक बचना चाहिये। कहा गया है-

अभिमानं सुरापानं गौरवं रौरवं ध्रुवम।
प्रतिष्ठा शूकरी विष्ठा त्रयं त्यक्त्वा हरिं भजेत॥
अर्थात अभिमान सुरापान जैसा है, गौरव निश्चित ही रौरव (एक नरक का नाम) है। प्रतिष्ठा शूकरी विष्ठा है। इन तीनों को छोड़कर हरि भजन करना चाहिये।

गौर से देखें तो आप पायेंगे कि वास्तव में इन तीनों से अहंकार तृप्ति के सिवा और कुछ नहीं मिलता। ये अहंकार के भोजन हैं, जितना भोजन मिलेगा अहंकार और मजबूत होता जायेगा और उसी अनुपात में हम सत्पथ से दूर होते जायेंगे।

7 comments:

Udan Tashtari said...

सदविचारों के लिए साधुवाद.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर विचार. शुभकामनाएं.

आपका इमेल एडरेस चाहिये. कृपया मेरे कमेंट बाक्स मे छोड दे. मैं उसे पब्लिश नही करुंगा.

क्रुपया संपर्क करें.

रामराम.

Anonymous said...

मेरा देश महान तक ठीक है लेकिन अहंकार तब आता है जब यह 'मेरा देश महान ,उनका देश बेईमान" हो जाता है

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सही कहा रविकांत जी, धन्यवाद!

Pyaasa Sajal said...

abhimaan thik hai par ahankaar katayee nahi...aapki baaton se sehmat hoon,par isko apne bartaav me utaarne ki zaroorat hai :)


www.pyasasajal.blogspot.com

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " said...

Ati aawashyak post hai is yug ke liye

श्याम सखा 'श्याम' said...

abhimaan thik hai par ahankaar katayee nahi...aapki baaton se sehmat hoon,par isko apne bartaav me utaarne ki zaroorat hai

शायद ये भाई कहना चाहते हैं
स्वाभिमान ठीक है ,अभिमान नहीं
आपने ठीक लिखा
व्यक्ति तीन विकार पालता है
धन ,यश ,मोह
धन का विकार को छोड़ पाना इन तीनो में सबब्से सरल है
दूसरे स्थान पर संभव है यश के विकार का त्याग
मोह-नामक विकार-स्त्री/पुरूष-[पति-पत्नी-प्रेमिका-प्रेमी]तत्पश्चात संतति का मोह सबसे कठिन माना गया है परन्तो.पस्चिमी जीवन शैली ने इसे उलट कर रख दिया है यानि वहां मोह त्याग एक,यश २ व धन विकार अन्तिम व न छूटने वाले हो गये हैं
श्याम सखा श्याम
‘.जानेमन इतनी तुम्हारी याद आती है कि बस......’
इस गज़ल को पूरा पढें यहां
श्याम सखा ‘श्याम’

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