Sunday, May 31, 2009

मैं कौन हूँ: एक स्वाभाविक प्रश्न

सभी पथिकों का स्वागत करते हुये पिछली चर्चा को आगे बढ़ाते हैं। पिछले पोस्ट में जिस विधि का जिक्र किया गया था उससे ये प्रतीति तो आ ही जायेगी कि मैं शरीर नहीं हूं। आरंभ में यह प्रतीति बार-बार खो जायेगी। कभी बिल्कुल स्पष्ट दिखेगा कभी चूक जायेगा। इससे निराश न हों और प्रयोग जारी रखें। धीरे-धीरे यह बात दृढ़ता से आपके लिये साफ़ हो जायेगी और आप मह्सूस कर पायेंगे कि आप शरीर नहीं हैं। "मैं शरीर नहीं हूं" इस खयाल के दृढ़ होते ही दो स्वाभाविक प्रश्न मन में उठते हैं-


१) यदि मैं शरीर नहीं हूं तो फ़िर मैं कौन हूं?

२) मैं शरीर नहीं हूं तो शरीर का क्या करे?


इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं। मैं कौन हूं इस प्रश्न का स्वाभाविक रूप से उठना आधी यात्रा पूरी कर लेने जैसा है। एक बार यह प्रश्न सम्यक रूप से आपको पकड़ ले फ़िर परमात्मा की दिशा में आपकी गति निश्चित है। ये जो प्यास है ये आपको खींचकर पानी तक ले जायेगी। ध्यान दें, ये प्रश्न आप्को रटना नहीं है बल्कि आप यदि ठीक दिशा में काम कर रहे हों तो अपने आप उठेगा।

दूसरी महत्त्वपूर्ण चीज ये है कि मैं अगर शरीर नहीं हूं तो फ़िर इस शरीर के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये। अक्सर यहां लोग चूक जाते हैं और सोचते हैं यदि ऐसा है तो शरीर को आदर देने की क्या जरूरत है? इस ख्याल ने अब तक भारी गड़बड़ की है और तथाकथित धार्मिक लोगों ने शरीर को सताने के सब तरह के उपाय खोज लिये हैं। इनसे बचें। ऐसा समझें-एक इनसान जिस घर में रहता है और भली प्रकार से जानता है कि वो घर नहीं है, उसे क्या करना चाहिये? क्या घर की साफ़-सफ़ाई जरूरी नहीं? अगर घर टूटता हो तो क्या उसकी मरम्मत जरूरी नहीं, अन्यथा तो बरसात काटनी मुश्किल हो जाये। शरीर भी एक घर की भांति है और इसकी सही देखभाल जरूरी है। यों कहें कि शरीर आत्मा के लिये मंदिर है। और मंदिर के लिये मन में आदर होना ही चाहिये।

आज की चर्चा को विराम देने से पहले एक बात और। हर दो-तीन पोस्ट के बाद एक पोस्ट सिर्फ़ परिचर्चा की होगी जिसमें कोई भी प्रश्न यदि आपके मन में आता हो और आध्यात्मिक उन्नति से संबंधित हो तो उस संबंध में बात की जायेगी। अपने प्रश्न टिप्पणि में दे दें।

8 comments:

"अर्श" said...

गुरु भाई ये कैसा परिचर्चा .. पहली दफा देख रहा हूँ ... आप तो प्रभु है ... और आप में क्या क्या गुण है .... ग़ज़ल लेखन के साथ साथ इस नश्वर शारीर के बारे में उपदेश उफ्फ्फ्फ़ कमाल की बात है ....जय हो ....


अर्श

नारदमुनि said...

narayan narayan

दिगम्बर नासवा said...

अच्छी शुरुआत करी है आपने...........रविकांत जी.........आगे भी कुछ ऐसी ही चर्चाएँ जारी रखें ............

वन्दना अवस्थी दुबे said...

swaagat hai...

राज भाटिय़ा said...

अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा, आज की परिचर्चा बहुत अच्छी रही.
धन्यवाद

नपुंसक भारतीय said...

Hanumaan se aapko kyaa dikkat hai?
Kahe falatoo baten karet ho auron ke blog par?
Yeh blog to theek hai.
Yadi auron ko nahin achcha bo sako to chup hi raho!

राजेंद्र माहेश्वरी said...

मैं कौन हूं? जो स्वयं से इस सवाल को नहीं पूंछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बन्द ही रह जाते है। उस द्वार को खोलने की चाबी यहीं हैं कि स्वयं से पूछो, `` मैं कौन हंू ? ´´ और जो तीव्रता से, समग्रता से अपने से यह सवाल पूछता हैं, वह स्वयं ही उत्तर भी पा जाता है।

Murari Pareek said...

प्रिय आत्मन,
बिलकुल सही कहा हम आत्मा हैं, जो मुह से से बोलती है, हाथों से कर्म करते है ठीक वैसे ही जैसे एक गाडी चलाने वाला ड्राइवर ड्राइविंग सीट पर बैठ के गाडी चलता है सारे कण्ट्रोल ठीक उसके आस पास | उसी भांति आत्मा का कंट्रोल रूम है मस्तिस्क और सारा कमांड आत्मा वहा से करती है, आत्मा का एक नाम "मर" भी है | जिसके निकल जाने पर हम कहते हैं "मर गया " गया यानी चला "गया", न की समाप्त हुआ, बातें बहुत लम्बी हैं |अपनी पसंद का टोपिक मिला इसलिए इतनी चर्चा करदी !!!!