Friday, May 15, 2009

कैसे जानें कि शरीर से परे भी कुछ है

सबसे पहले तो स्वागत करता हूं उन सब मित्रों का जिन्होने इस पथ में रुचि दिखाई है क्योंकि स्वयं को जानने से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है और श्रेष्ट हमेशा स्वागतयोग्य होता है। आज चर्चा करते हैं इस संबंध में कि कैसे जानें कि शरीर से परे भी कुछ है। विचार करेंगे तो पायेंगे कि जो विधि मैं बता रहा हूं वह साधारण होते हुये भी अत्यंत कारगर है। यह खयाल में ले लें कि किसी भी चीज को जानने के लिये कई प्रमाणों की आवश्यकता होती है। मुख्य रूप से प्रमाण ऐसे गिनाये जा सकते हैं-

१.आप्त वचन प्रमाण अर्थात श्रेष्ठ पुरूषों द्वारा कहे गये वचन
२.श्रुति प्रमाण अर्थात श्रेष्ठ पुस्तकों दरा प्राप्त प्रमाण
.युक्ति प्रमाण अर्थात तर्कसंगत तरीके से उदाहरण देकर समझाई गई बात
४.
अनुभव प्रमाण

ध्यान रहे कि प्रथम तीन प्रमाण सहायक हैं चौथे के लिये। जब तक सत्य अपना निजि अनुभव न बने तब तक अन्य सभी प्रमाण निष्फल हैं। तो इससे पहले कि हम आगे सत्य की कुछ चर्चा करें मैं युक्ति प्रमाण से आपको प्रयोग करने को कहता हूं।

तरीका बहुत आसान है। सुविधा के लिये
इसे तीन चरणों में विभाजित करें
अ)
अपने आसपास निरीक्षण करें, चीजों को देखें और
ब) जो दिखे उससे निष्कर्ष निकालें और अंत में
स)
इस प्राप्त निष्कर्ष का अपने ऊपर प्रयोग करें

आईये शुरू करते हैं। देखें अपने आसपास ....और सोचें...मुझे मकान दिखाई पड़ता है और मैं मकान नहीं हूं...मुझे फूल दिखाई पड़ता है और मैं फूल नहीं हों....मुझे दीवार दिखाई पड़ती है और मैं दीवार नहीं हूं...इस तरह जितनी भी चीजें दिखाई देती हैं उन्हे देखें और सोचे कि क्या मैं यह हूं, आप पायेंगे कि आप वह नहीं हैं बल्कि आप उस चीज से सर्वथा भिन्न हैं। अब निष्कर्ष निकालें....जो दिखाई पड़ता है (अर्थात दृश्य) और जो देखता है (अर्थात द्रष्टा) एक नहीं होते बल्कि अलग-अलग होते हैं। इसी तरह आप प्रयोग करेंगे तो पायेंगे कि ज्ञान और ज्ञात एक नहीं होते। अब इस प्राप्त निष्कर्ष का उपयोग करते हैं। यह निष्कर्ष आपके अपने प्रयोग पर आधारित है अतः इसमें शक की कोई गुंजाईश ही नहीं है। अब देखें ...आपको अपना शरीर दिखाई पड़ता है? निश्चित रूप से उत्तर हां है...अब हमारा निष्कर्ष कहता है दृश्य और द्रष्टा एक नहीं होते...फ़िर यदि आपको शरीर दिखाई पड़ता है तो आप शरीर
कैसे हो सकते हैं? इस पर बार-बार विचार करें। एकबार यह आपके सामने साफ हो जाये कि आप शरीर नहीं हैं फ़िर आगे की यात्रा आसान हो जाती है। मैं शरीर नहीं हूं यह बात हमें समझनी है, केवल इसलिये सच मानकर रटने की कोई जरूरत नहीं है कि किताबों में ऐसा लिखा है। अगले अंक में इस चर्चा को और आगे बढ़ायेंगे तब तक के लिये इस प्रयोग को जारी रखें।

9 comments:

Neeraj Rohilla said...

अगली कडी का इन्तजार रहेगा।

अल्पना वर्मा said...

'स्वयं को जानने से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है 'satya vacha...


--rochak lekh..

Mahesh Sinha said...

yehi satya hai, jin khoja tin paaiyan

योगेन्द्र मौदगिल said...

अरे वाह भाई ये विषय भी बढ़िया है बस निरन्तरता बनाए रखना बधाई

नीरज गोस्वामी said...

इतनी कलिष्ट बात को जिस आसानी से आपने समझाया है उसकी जितनी प्रशंशा की जाये कम है...जीवन जीना सिखलाती है आपकी ये पोस्ट...
नीरज

Babli said...

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ कि आपको मेरी शायरी और उसके साथ चित्र दोनों पसंद आए!
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

राज भाटिय़ा said...

दोवारा नही कई बार पढना पडेगा आप का ब्लांग, आप ने बहुत सहज तरीके से बात कही, लेकिन यह इतनी आसान नही, आप की अगली कडी का इंतजार रहेगा.
धन्यवाद

現在建築式™ said...

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Nice to meet you
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vandana gupta said...

एकबार यह आपके सामने साफ हो जाये कि आप शरीर नहीं हैं

यही है वो परम सत्य …………दृश्य और द्रष्टा का भेद